<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421</id><updated>2011-04-21T11:23:12.666-07:00</updated><title type='text'>शब्द युद्ध</title><subtitle type='html'>जिन्दगी के चौथे कोण पर यह है कैसी अंधी लड़ाई 
कुछ नहीं आता समझ में कुछ नहीं देता दिखाई</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>12</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-8619517029514301555</id><published>2008-09-30T10:54:00.000-07:00</published><updated>2008-09-30T10:55:18.674-07:00</updated><title type='text'>चंबल का दूसरा चेहरा भी है..</title><content type='html'>चंबल के बीहड़ों की जब भी चर्चा चलती है तो अनायास ही बागी सरदार मान सिंह से शुरू हुई एक परंपरा लाखन सिंह, रूपा, पुतली बाई से चलकर मोहर सिंह, माधव सिंह,मलखान सिंह से होती हुई निर्भय गुर्जर तक पहुंचकर थोड़ा रुकती है और भविष्य के नामों के लिए बांहें फैलाने लगती है। मगर चंबल की यह घाटी महर्षियों की तपोभूमि और क्रंतिकारियों तथा कलाकारों की साधना स्थली रही है, यह बात दुर्भाग्य से हर बार अचीन्ही रह जाती है। पौराणिक गाथाओं की आभा से दीप्त-प्रदीप्त महर्षि भिंडी ( जिनके नाम से भिंड नगर बसा) और गालव ( जिनके नाम से ग्वालियर नगर बसा) की तपःस्थली के ही पुण्य-प्रसून थे-संगीत सम्राट तानसेन और बैजू बावरा। रायरू गांव की गूजरी, जो आगे चलकर राजा मानसिंह की रानी मृगनयनी बनती है,जिसने अपने पराक्रम से यवन सेना को पराजित करके तोमर वंश की यशःगाथा को इतिहास में दर्ज कराया था, वह इसी चंबल की माटी की बेटी थी। इसी चंबल की माटी के पुत्रों को बागी संबोधन का क्रांतिकारी चेहरा देनेवाले मैनपुरी षड्यंत्र कांड के पं.गैंदालाल दीक्षित ने मई गांव में ही बैठकर क्रांति का ताना-बाना बुना था और उनके शिष्य काकोरी कांड के महानायक पं. रामप्रसाद बिस्मिल (जिनके बाबा तंवरघारःअंबाह के थे ) ने भदावर राज्य के पिनाहाट और होलीपुरा में फरारी के दिनों में मवेशी चराते हुए मनकी तरंग और कैथराईन-जैसी कृतियों का सृजन किया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जब पूरे देश में लौ बुझने लगी थी तो चंबल और यमुना के दोआब में रूपसिंह और निरंजन सिंह ने तात्याटोपे और शाहजादा फिरोजशाह को साथ लेकर फिरंगी सेना को धूल चटाते हुए यहां आजादी का परचम फहराकर एक नया इतिहास लिख दिया था। यहां के लोकगीत लंगुरिया और सपरी में चंबल की माटी की सौंधी-सौंधी गंध महकती है। और शस्त्रीय संगीत में ग्वालियर घराना क्या हैसियत रखता है, यह बताना निहायत अनुत्पादक श्रम होगा। इस क्षेत्र के बुद्धिजीवी, चंबल के इस सांस्कृतिक आयाम को, जो कि दुर्भाग्यवशात् अचीन्हा ही रह जाता है,व्यापक फलक पर लाकर सर्वव्यापी बनाएं,इस सार्थक प्रयास की मैं उनसे पूरी शिद्दत के साथ उम्मीद करता हूं...एवमस्तु।।&lt;br /&gt;विनयावनत&lt;br /&gt;पं. सुरेश नीरव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-8619517029514301555?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/8619517029514301555/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=8619517029514301555' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/8619517029514301555'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/8619517029514301555'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/blog-post_30.html' title='चंबल का दूसरा चेहरा भी है..'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-1590420116276547460</id><published>2008-09-30T08:59:00.000-07:00</published><updated>2008-09-30T09:45:51.543-07:00</updated><title type='text'>Patrika further consolidates position in MP with Indore edition</title><content type='html'>After launching its Bhopal edition in May 2008, Hindi daily Patrika now seeks to further consolidate its position in Madhya Pradesh with its Indore edition. Arvind Kalia, NHM Marketing is confident that with the launch of the Indore edition, Patrika would become a promising option for advertisers to reach key consumers in the state.&lt;br /&gt;He claimed that Bhopal and Indore accounted for 74 per cent of total ad spends on the state. A survey team of more than 450 members divided Indore into eight zones and conducted an extensive survey, which helped in charting out readers' preference, expectations, locate dissatisfaction areas and create brand awareness. 4.25 lakh households and business establishments were contacted during the survey.&lt;br /&gt;Based on the survey and research findings, Patrika's Indore edition is packed with new features, which differentiate the product from existing players in the market. The accent is clearly local.&lt;br /&gt;BR Singh, General Manager, Circulation, Patrika, informed that an army of sales personnel had been employed. He claimed that Patrika's entry in Madhya Pradesh had resulted in competitor sliding prices, throwing new product after product.&lt;br /&gt;Promotional activities for the Indore edition include the full gamut of media covering not just the conventional BTL and ATL activities, but also reaching consumers through more interactive and innovative channels establishing connect at multiple levels.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-1590420116276547460?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/1590420116276547460/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=1590420116276547460' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/1590420116276547460'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/1590420116276547460'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/patrika-further-consolidates-position.html' title='Patrika further consolidates position in MP with Indore edition'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-8822499035855466503</id><published>2008-09-28T06:35:00.000-07:00</published><updated>2008-09-28T07:18:43.678-07:00</updated><title type='text'>मुसलमान नौजवानों, भागो मत दुनिया बदलो</title><content type='html'>-अफलातून भाई का आरकुट पर संदेश के अंश&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt; आतंकवाद के खिलाफ   &lt;/span&gt;लड़ाई राजनैतिक नहीं होनी चाहिए । मुख्यधारा की राजनीति की कमियों और कुछ नेताओं के अललटप्पू बयानों के कारण उनके दिमाग में यह ग़लतफ़हमी है । ‘दिल्ली के जामिया नगर में हुई पुलिस मुठभेड़ फर्जी थी ‘ कई मुस्लिम समूह और मानवाधिकार संगठन यह मान रहे हैं । इस सन्दर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति रामभूषण मल्होत्रा द्वारा दिया गया एक फैसला   महत्वपूर्ण है। रामभूषणजी नहीं चाहते कि उनके नाम के आगे न्यायमूर्ति लगाया जाए । चूँकि यह उनके द्वारा दिए गए फैसले की बात है इसलिए ‘न्यायमूर्ति’ लगाना उचित है। अपने फैसले हिन्दी में देने के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा। उक्त फैसले में कहा गया था कि जब भी पुलिस ‘मुठभेड़’ का दावा करती है उन मामलों में (१) मृतकों के परिवार को पुलिस द्वारा सूचना दी जाएगी तथा (२) ऐसे सभी मामलों की मजिस्टरी जाँच होगी । यदि यह घटना जामिया नगर की जगह नोएडा में होती तो इन दोनों बातों को खुद-ब-खुद लागू करना होता।घटना की जाँच की माँग एक अत्यन्त साधारण माँग है तथा पूरी पारदर्शिता के साथ इसे पूरा किया जाना चाहिए ।&lt;br /&gt;इन मानवाधिकार संगठनों और मुस्लिम समूहों से भी हम रू-ब-रू होना चाहते हैं । इतनी गम्भीर परिस्थिति में बस इतना संकुचित रह कर काम नहीं चलेगा । आतंकी घटनाओ और उसके तार देश के भीतर से जुड़े़ होने की बात पहली बार खुल के हो रही है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत के तमाम अमनपसंद मुसलमानों को भुगतना पड़ रहा है । इन घटनाओं के बाद संकीर्ण सोच वाले साम्प्रदायिकमूह हर मुसलमान को गद्दार बताने का अभियान शुरु कर चुके हैं, आगामी लोकसभा निर्वाचन में वोटों के ध्रुवीकरण की गलतफहमी भी वे पाले हुए हैं । आतंकवाद से मुकाबले की नाम पर क्लोज़ सर्किट टेवि जैसे करोड़ों के उपकरण खरीदें जायेंगे और इज़राइली गुप्त पुलिस ‘मसाद’ से तालीम दिलवाई जाएगी । कैनाडा और अमेरिका मे रहने वाले अनिवासी भारतीयों से पूछिए कि पैसे कि ताकत पर कैसे यहूदी लॉबी नीति निर्धारण में हस्तक्षेप करती है ? इन सब से गम्भीर और नुकसानदेह बात यह है कि मेधावी तरुण यदि ‘आतंक’ में ग्लैमर देखने लगें तो उन्हें उस दिशा से रोकने और अन्याय की तमाम घटनाओं के विरुद्ध राजनैतिक संघर्ष से जोड़ने का काम कौन करेगा ? यह काम मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ा कोई खेमा शायद नहीं करेगा।&lt;br /&gt;एक मुस्लिम महिला पत्रकार और कवयित्री ने अपने चिट्ठे पर लिखा , ‘कि दिल्ली का बम काण्ड करने वाले जरूर हिन्दू रहे होंगे’। अत्यन्त सिधाई से उन्होंने यह बात कह दी। मैंने यह देखा है कि शुद्ध असुरक्षा की भावना से ऐसी बातें दिमाग में आती हैं ।‘काम गलत है, इसलिए जरूर हमारे समूह का व्यक्ति न रहा होगा’ - यह मन में आता होगा । राष्ट्रीय एकता परिषद , सर्वोच्च न्यायालय और संसद के सामने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की कसमे खाने वाली जमात ने जब उस कसम को पैरों तले मसलने में अपना राष्ट्रवाद दिखाया तब किसी हिन्दू के दिमाग में क्या यह बात आई होगी कि जरूर यह काम हमारे समूह से अलग लोगों ने किया होगा ? जिन्हें लगता है कि "वह काम सही था और इसीलिए हमारे समूह ने किया" - उन राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवादियों से हमे कुछ नहीं कहना , उनके खतरनाक मंसूबों के खिलाफ़ लड़ना जरूर है ।&lt;br /&gt;मैंने आतिफ़ का ऑर्कुट का पन्ना पढ़ा है जिसमें वह फक्र के साथ एक फेहरिस्त देता है कि किन शक्सियतों के आजमगढ़ से वह ताल्लुक रख़ता है - ……. राहुल सांकृत्यायन , कैफ़ी आज़मी । चार लोगों को जिन्दा जमीन में गाड़ देने वाले भाजपा नेता (पहले सपा और बसपा में रहा है) रमाकान्त यादव या भारत की सियासत के सबसे घृणित दलाल अमर सिंह का नाम नहीं लिखता ! ऐसा कोई तरुण घृणित , अक्षम्य आतंकी कार्रवाई से जुड़ता है , उन कार्रवाइयों की तस्वीरें उतारता है तो निश्चित तौर पर इसकी जिम्मेदारी मैं खुद पर भी लेता हूँ । अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का तरीका आतंकवाद नहीं है । आजमगढ़ के शंकर तिराहे के आगे , मऊ वाली सड़क पर प्रसिद्ध पहलवान स्व. सुखदेव यादव के भान्जे के मकान में समाजवादी जनपरिषद के दफ़्तर के उद्घाटन के मौके पर आजमगढ़ के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और फोटोग्राफर दता ने राहुलजी का लिखा गीत दहाड़ कर गाया था - ‘ भागो मत ,दुनिया को बदलो ! मत भागो , दुनिया को बदलो ‘ । आजमगढ़ के तरुणों से यही गुजारिश है ।&lt;br /&gt;साभार--विनित उत्पल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-8822499035855466503?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/8822499035855466503/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=8822499035855466503' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/8822499035855466503'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/8822499035855466503'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/blog-post_2633.html' title='मुसलमान नौजवानों, भागो मत दुनिया बदलो'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-7904353275617618748</id><published>2008-09-28T06:19:00.000-07:00</published><updated>2008-09-28T06:28:10.402-07:00</updated><title type='text'>इस्लाम और इंसानियत खतरे में</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SN-GPUZiX-I/AAAAAAAAABY/0H4gKC6vtIg/s1600-h/abu.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SN-GPUZiX-I/AAAAAAAAABY/0H4gKC6vtIg/s320/abu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5251063288269266914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;        -अबरार अहमद&lt;br /&gt;मन अंदर ही अंदर मुझे कचोट रहा है। एक अरसे से। संभालने की कोशिश की एक आम आदमी की तरह। एक आम हिंदुस्तानी की तरह मगर रोक न सका खुद को। चाहे जयपुर धमाका हो या अहमदाबाद, यूपी के तमाम शहरों में बम फटे हों या दिल्ली को तबाह करने की नापाक कोशिश की गई हो हर बार दिल से एक आह जरूर निकली। एक पत्रकार होने के नाते भले ही रोया नहीं लेकिन इंसान होने के नाते आंखें नहीं मानीं। बेगुनाह लोगों को निशाना बनाने उनहें मारने और तबाही फैलाने का हक कोई भी धर्म किसी को नहीं देता। इस्लाम भी नहीं। इस बात को समझना होगा।&lt;br /&gt;इंडियन मुजाहिददीन के नेटवर्क के खुलासे ने सबको चौंका दिया है। इस आतंकी फौज में जितने भी सदस्य शामिल हैं वह 16 से 30 साल के हैं। सब पढे लिखे और सभ्य परिवारों से हैं। इनके परिवार का कोई भी सदस्य अपराधी पृष्ठभूमि से नहीं। यह युवक भी पढे लिखे हैं और इनमें से कई उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे और सबसे अहम बात यह कि अब तक जीतने भी युवक पकडे गए हैं वह सभी मुसलमान हैं। और जो नाम सामने आ रहे हैं वह भी मुस्लिम ही हैं।&lt;br /&gt;मैं खुद मुसलमान हूं और इस खुलासे से आहत हूं। मेरा मानना है कि अब वाकई में इस्लाम खतरे में है और इसे बचाने के लिए जेहाद की जरूरत है। वह कौन लोग हैं जो आपके बच्चों को बरगला कर आतंक की राह पर पहुंचा रहे है। क्या वजह है कि पढा लिखा मुसलमान इंसानियत का फर्ज भूलकर तबाही की राह पकड रहा है। वह कौन है जो इस्लाम को नेस्तानाबूद करने पर तूला है। जरूरत है तो अपने बच्चों को सही तालिम देने की। उन्हें समझाने की और इंसानियत का पाठ पढाने की ताकि हमारी अगली पीढी किसी नापाक हाथ की कठपुतली न बन सके। देश भर के मुसलमान भाईयों को अब जेहाद छेडनी होगी तभी इस्लाम को बचाया जा सकेगा तभी इंसानियत को बचाया जा सकेगा।&lt;br /&gt;यह एक लंबी लडाई है। लेकिन इसकी शुरुआत आज से ही हो जानी चाहिए। अगर इस्लाम को बचाना है तो हमे अपनी अगली पीढी को सही राह दिखानी होगी। वह राह जो दिन की राह है। और यह जिम्मेदारी हमारे धर्म गुरुओं की है। जरूरत है कि वह आगे आएं और लोगों से इस बात कि अपील करें उन्हें सही राह दिखाएं।आतंकवाद के खिलाफ उलेमा आगे आए हैं लेकिन इस बात को एक सिस्टम के तहत लाना होगा। उन्हें धर्म का सही मकसद और इंसानियत का पाठ पढाने के लिए एक व्यवस्था बनानी होगी। आखिर यह इस्लाम के वजूद का मामला है। इंसानियत के वजूद का मामला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - लफ्ज ब्लाग, अमर उजाला&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-7904353275617618748?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/7904353275617618748/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=7904353275617618748' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/7904353275617618748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/7904353275617618748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html' title='इस्लाम और इंसानियत खतरे में'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SN-GPUZiX-I/AAAAAAAAABY/0H4gKC6vtIg/s72-c/abu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-6725767404662413993</id><published>2008-09-23T12:23:00.000-07:00</published><updated>2008-09-23T12:27:48.905-07:00</updated><title type='text'>बडे भाई निशीथ जोशी की कलम से</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SNlDI4R5VPI/AAAAAAAAABQ/0-XT9Z7Zeq0/s1600-h/joshi+ji.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249300660502484210" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SNlDI4R5VPI/AAAAAAAAABQ/0-XT9Z7Zeq0/s320/joshi+ji.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_976z0OlvffE/SNKjZ2RUhXI/AAAAAAAAAGM/nUAY44Xb_X4/s1600-h/joshi+ji.jpg"&gt;&lt;/a&gt;स्वर्गीय आपा और लाला भाई (मो माबूद ) के नाम जिनके बिना ये बेटा इतना बड़ा नहीं हो सकता था। आपकी बहुत यद् आती है। इंशा अल्लाह कभी तो मुलाकात होगी। वैसे तो आप हरदम मेरे साथ हो। कभी तहजीब के रूप में तो कभी दुआओं के ताबीज के रूप में। सिर्फ़ यही है मेरी जिंदगी की कमाई -------निशीथ &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खौफ ------ &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रोक लो इन हवाओं को&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मत आने दो शहर से&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मेरे गांव की ओर &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वरना मंगल मामा&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हिंदू हो जाएगा &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;और रहमत चाचा &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मुसलमान हो जाएगा &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;और रहमत चाचा मुसलमान.....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-6725767404662413993?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/6725767404662413993/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=6725767404662413993' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/6725767404662413993'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/6725767404662413993'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/blog-post_23.html' title='बडे भाई निशीथ जोशी की कलम से'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SNlDI4R5VPI/AAAAAAAAABQ/0-XT9Z7Zeq0/s72-c/joshi+ji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-4164342745823051742</id><published>2008-09-16T11:59:00.000-07:00</published><updated>2008-09-16T12:00:45.700-07:00</updated><title type='text'>सैटेलाइट चैनलों के मालिकों, समय न करेगा माफ !</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SNACSgTTqhI/AAAAAAAAABI/NEzE8IPJMXw/s1600-h/an.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5246696082818443794" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SNACSgTTqhI/AAAAAAAAABI/NEzE8IPJMXw/s320/an.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;आलोक नंदन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सऊदी अरब के मुख्य न्यायाधीश शेख सालिह अल लोहैदान मीडिया के कंटेंट पर हत्थे से गरम हैं। उन्होंने सैटेलाइट चैनलों के मालिकों को, जो अनैतिक और आपत्तिजनक कार्यक्रम दिखाते हैं, मार देने की बात कही है। सऊदी अरब के कानून भारत में नहीं लागू हो सकते, यहां डेमोक्रेसी है। लेकिन लोहैदान की बात से साफ है कि भारत में भी मीडिया को कड़ाई से रोकने की जरूरत है। समाज को गंदा करने में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, समाज के एक वर्ग की यह आम राय है।&lt;br /&gt;इस आम राय को 'जनरल विल' के साथ जोड़कर देखने पर लोहैदान की बात भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक हो जाती है। सरकारी रेडियो पर जब एक श्रोता के सवाल के जवाब में लोहैदान ने कहा, ''इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसे कार्यक्रमों में सिर्फ हैवानियत होती है, ऐसी चीजों को बढ़ावा देने वाले को यदि किसी और तरीके से नहीं रोका जा सकता तो उन्हें मार देना चाहिए।''&lt;br /&gt;इस बातचीत की आडियो क्लिप धड़ाधड़ बंट रही है, और लोग उसे इंज्वाय कर रहे हैं।&lt;br /&gt;प्रश्न उठता है कि अनैतिक कार्यक्रम का मापदंड क्या है? जो समाज को गंदा करे, उसे पतन की ओर ले जाए, लोगों में भय का संचार करे, उनकी खोपड़ी पर खौफ की बरसात कर दे, कम उम्र में बच्चों को सेक्स की ओर ढकेल दे...आदि। टीआरपी की दौड़ को भी परखना होगा कि इस पर अव्वल आने वाले कार्यक्रम नैतिकता और अनैतिकता के कितने करीब हैं। भारत में मौत की सजा तो बेमानी बात है, लेकिन मीडिया की भूमिका पर एक सार्थक परिकल्पना के साथ बढ़ा जा सकता है। मीडिया एक साधन है, साध्य नहीं। इसलिए इसकी भूमिका पर गहन विचार की जरूरत है, शेख सालिह अल लोहैदान से ही शुरू किया जा सकता है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-4164342745823051742?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/4164342745823051742/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=4164342745823051742' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/4164342745823051742'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/4164342745823051742'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/blog-post_16.html' title='सैटेलाइट चैनलों के मालिकों, समय न करेगा माफ !'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SNACSgTTqhI/AAAAAAAAABI/NEzE8IPJMXw/s72-c/an.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-568122685242923038</id><published>2008-09-11T10:36:00.001-07:00</published><updated>2008-09-11T10:46:17.617-07:00</updated><title type='text'>रंगबाज पूरबियों को ले डूबी रंगदारी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;विजय शंकर पांडेय&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के शातिर शोहदे अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पलते-बढ़ते हैं &lt;span class=""&gt;तो&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SMlYhvhWT_I/AAAAAAAAABA/9tozLpv2o-Y/s1600-h/x.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5244820577764921330" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 167px; CURSOR: hand; HEIGHT: 163px" height="233" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SMlYhvhWT_I/AAAAAAAAABA/9tozLpv2o-Y/s320/x.jpg" width="292" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; मुंबई के माफिया डॉन पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वाचल) की नर्सरी में आकार लेते हैं. यकीन मानिए, यही सच है. बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभालने वाले व उत्तरा‌र्द्ध में देश को नेतृत्व प्रदान करने वाले अपने उत्तम प्रदेश अर्थात उत्तर प्रदेश की इक्कीसवी सदी की शुरुआत में यही पहचान है. ग्लोबलाइजेशन के दौर में मेच्योरिटी की ओर बढ़ रहा है भारतीय लोकतंत्र. ऐसे में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए पूरबिया प्रोफेशनल क्रिमिनल कम पॉलिटिशियन जनतंत्र का नया मुहावरा गढ़ने में मशगूल हैं. मंडल-कमंडल के झंझावातों को झेल नई जमीन तलाश रहे पूर्वाचल के सामाजिक व्याकरण के सिलेबस में भी आमूल चूल परिवर्तन हुआ है. क्लासिकल सामंतवाद के रंगमंच पर सिर्फ पात्र बदले हैं, पटकथा वही है.हाल के दिनों के आपराधिक रिकार्डो पर गौर करें तो पता चलेगा कि पूर्वाचल के कई जिले अपराधियों के अभ्यारण्य में तब्दील हो चुके हैं. हर दूसरे-तीसरे दिन यहां कोई न कोई टपका दिया जाता है. गैंगवार के मामले में भी यहां के कई शहर अब मुंबई व सिंगापुर से सीधे ताल ठोक सकते हैं. सर्व विद्या की राजधानी मोक्षदायिनी काशी अब अपने रंगदारों के बूते पहचानी जा रही है. कहते हैं भोले नाथ की नगरी काशी के वासी मिजाज से भौकाली होते हैं. जेब में फुटी कौड़ी न भी हो तो रंगबाजी से बतियाना उनकी फितरत है. किसी जमाने में पूरबिये किसी दिग्गज राजनेता, साहित्यकार या किसी शिक्षाविद् के नाम की धौंस जमाया करते थे. अब किसी न किसी माफिया डॉन तक पहुंच की हेकड़ी बघारते हैं. अंडरव‌र्ल्ड में बढ़ रही उसकी साख किसी भी भले मानुष के पेशानी पर बल डाल सकता है. वैसे यह अंदर की बात है. सच तो यह है कि रंगदारी ने रंगबाज पूरबियों का बंटाधार कर दिया है.अपने मिजाज की त्रासदी झेल रहा है पूर्वाचल. प्राकृतिक तौर पर अपराधी न होते हुए भी अपने अह्म की तुष्टि के लिए पूरबियों की नई पीढ़ी यदा-कदा कानून हाथ में लेने से गुरेज नहीं करती. इसके बाद कुछ मनबढ़ लंबे हाथ मारने से भी नहीं चुकते. ऐसे ही कुछ युवा अपराध की दलदल में फंसते जा रहे हैं तो कुछ खुद को मॉडर्न दिखाने की ललक में अपराधियों के मोहरे बनते जा रहे हैं. ये रंगबाज दीमक की तरह धीरे-धीरे पूर्वाचल की संपन्नता व व्यापार को चाटते जा रहे हैं. नतीजा आपके सामने है.पूर्वाचल में और उसमें बढ़ते अपराध कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं. हत्या, लूट, रंगदारी, अपहरण व बलात्कार सरीखे वारदातों की बढ़ती तादाद ने पूर्वाचल का इतिहास-भूगोल ही नहीं, अर्थशास्त्र को भी डावांडोल कर दिया है.इस साल के शुरुआत के तीन महीनों में हत्या व लूट की तकरीबन दर्जन भर वारदातों को अकेले वाराणसी शहर में ही अंजाम दिया जा चुका है. गुजरे साल का लेखा-जोखा तो गोया खून से ही लिखा गया था. हत्या, लूट व अपहरण सरीखी वारदात अब पूर्वाचल के लिए एक आम बात है. ऐसी विषम परिस्थितियों में कोई उद्योगपति या व्यवसायी यहां आकर कारोबार करने के विषय में भला कैसे व क्यों सोचेगा? कई कारणों से पूर्वाचल की अपनी महत्ता है. मगर जिन विषम परिस्थितियों से मुखातिब है पूर्वाचल, दयनीय कानून-व्यवस्था उसकी सारी उपलब्धियों पर पानी फेरने के लिए काफी है. जान है तो जहान है. यहां के समर्थ उद्योगपति व व्यवसायी पलायन को लाचार हैं. जो किन्ही कारणों से पलायन नहीं कर सकते, वे भी पुलिस व प्रशासन के भरोसे नहीं, उन आततायियों के रहमोकरम पर ही रोजी-रोटी कमा रहे हैं, जो उनकी सुपारी हाथ में लिए घूम रहे हैं.माफिया डॉन सुभाष ठाकुर ने पिछले दिनों एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि आपराधिक प्रतिभाओं के लिहाज से उर्वरा है पूर्वाचल की धरती. सबसे बड़ी बात यहां के युवा अपराधी कम से कम अपने आका से विश्वासघात नहीं करते. यही उनकी पूंजी है. इसीके बूते अंडरव‌र्ल्ड में इस तबके के पूरबियों की धाक है. वैसे पूर्वाचल में बढ़ रहे अपराध का एक अहम कारण भयंकर बेरोजगारी भी है. आईपीएस सुजीत पांडेय ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि बेरोजगारी पूर्वाचल में बढ़ते अपराध का बुनियादी कारण है. मिजाज से रंगबाज व भौकाली होने के कारण इस क्षेत्र के युवकों का एक तबका व्हाइट कलर जॉब की ताक में रहता है. जाहिर है सभी की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकती. ऐसी हालत में वे छोटे-मोटे व्यवसाय की बजाय शॉर्टकट रास्तों के जरिए फटाफट अपना लक व लुक दोनों बदलना चाहते हैं.उदार अर्थव्यवस्था व भूमंडलीकरण की बदौलत काशी व उसके आसपास के शहरों में कमाने के जरिए भले न बढ़े हों, सपने व महत्वकांक्षाएं जरूर युवा पीढ़ी के दिल-दिमाग में पैठ बनाईं हैं. इन्हें हासिल करने की ललक के चलते लोगों के खर्चे बेहिसाब बढ़े हैं. संबंधित तबका इन खर्चो को पूरा करने के लिए बेजां हरकतें करने से बाज नहीं आता. गलत संगत में पड़कर कई भले घरों के लड़के घोड़े पर उंगलियां टिकाए यायावरी जीवन बिताने को मजबूर हैं. महज ब्रांडेड कपड़े-जूते, मोबाइल व थोड़े बहुत नोटों के लालच में कई लड़के सत्या ब्रांड शूटर्स बन गए हैं. अब उनके पास सब कुछ है, सिवाय चैन की नींद के. रही सही कसर पूरी कर देता है पड़ोसी राज्य बिहार. न सिर्फ असलहे अपितु कोच भी मुहैया करवाता है बिहार. जरूरत पड़ने पर पुलिस से छिपने के लिए वहां शरण भी उपलब्ध है. वैसे ऐसे तत्वों को संरक्षण प्रदान कर अपना उल्लू सीधा करने से पूर्वाचल के राजनेता भी बाज नहीं आते. जी हां, पूर्वाचल की बिगड़ी तबीयत के लिए कई कारक ग्रह मौजूद है. विडंबना तो यह है कि काशी समेत समूचे पूर्वाचल की तीमारदारी का अहम दायित्व जिन्हें सौंपा गया है, उनमें से कई जनप्रतिनिधियों का टांका सीधे अंडरव‌र्ल्ड से जुड़ा है. जो सीधे नहीं जुड़े हैं, वे भी घुमा फिरा कर थोड़ी बहुत मोंगाबो को खुश करने की जुगत भिड़ाने की हैसियत रखते हैं. जाहिर है ऐसे हालात में काशी की हिफाजत तो इसके शाश्वत कोतवाल (भैरो बाबा) ही कर सकते हैं.कोलकाता, दिल्ली, मुंबई हो या मारीशस व त्रिनिदाद, हाड़तोड़ मेहनत के लिए अभ्यस्त पूरबिए जहां भी गए वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन उभरे. लगभग दस साल पहले नई दिल्ली के मावलंकर हाल में अखिल विश्व भोजपुरी सम्मेलन के सालाना जलसे को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा था महानगर ही नहीं, बीहड़ में भी आर्थिक तौर पर स्वावलंबी हो परचम लहराने का माद्दा भोजपुरी भाषियों में है, मगर दीप तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ करता है इनका अपना घर, अपना इलाका. क्या वजह है कि यहां की प्रतिभाएं अन्यत्र रंग दिखाती हैं, जबकि यहां लाचार दिखती हैं? ये सवाल अब भी अनुत्तरित है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-568122685242923038?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/568122685242923038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=568122685242923038' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/568122685242923038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/568122685242923038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/09/blog-post_11.html' title='रंगबाज पूरबियों को ले डूबी रंगदारी'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_YoXK-1J8-1w/SMlYhvhWT_I/AAAAAAAAABA/9tozLpv2o-Y/s72-c/x.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-3739468454238408324</id><published>2008-08-14T12:00:00.000-07:00</published><updated>2008-09-26T13:20:44.138-07:00</updated><title type='text'>बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा</title><content type='html'>बिल्ली के भाग्य से छींका टूटाकहावत है कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। जम्मू-कश्मीर में कुछ सियासी लोगों की हरकतों की वजह से पाकिस्तान की बन आई है। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने पर पहले कश्मीर फिर जमीन वापस लेने के बाद जम्मू संभाग में हुए हिंसक आंदोलन। उसके बाद कश्मीर की आर्थिक नाकेबंदी के विरोध में कश्मीर के फल उत्पादकों का मुजफ्फराबाद मार्च और उस दौरान व उसके बाद हुई हिंसा को मु ा बनाकर पाकिस्तान इस मामले का अंतरराष्ट ्रीयकरण करने की फिराक में है। पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों की कार्रवाई को अनुचित बताया और कहा कि वहां हिंसा तुरंत बंद होनी चाहिए। कुरैशी के इस बयान पर भारत ने चेताया भी, लेकिन बुधवार को पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रव ता मोहम्मद सादिक ने मामले को अंतरराष्ट ्रीय समुदाय, खासकर संयु त राष्ट ्र, आर्गेनाइजेशन ऑफ इसलामिक कांफ्रेंस और मानवाधिकार संगठनों के पास ले जाने की धमकी दे दी। इस पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रव ता नवतेज सरना ने कहा कि पाकिस्तान की तरफ से लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। सरना ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से जारी पाकिस्तानी बयानबाजी पर भारत को कड़ी आपत्ति है। अभी समय है कि पाकिस्तान बयानबाजी से बाज आए। दूसरी ओर संयु त राष्ट ्र के प्रव ता फरहान हक का कहना है कि संगठन अभी कश्मीर के ताजा हालात पर नजर रखे है। इस समय संयु त राष्ट ्र इस मु े पर कोई बयान जारी नहीं करेगा। संयु त राष्ट ्र के मानवाधिकार अधिकारी ताजा हालात से वाकिफ हैं और वे बयान जारी करने या नहीं करने पर विचार कर रहे हैं। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मामला कितना गंभीर होता जा रहा है। पाकिस्तान के बयान पर भारत को सख्त ऐतराज है। भारत ने चेतावनी भी दी है कि पाक जम्मू-कश्मीर मामले में दखलांदाजी न करे। यह भारत का आतंरिक मामला है। बेशक भारत कश्मीर को आतंरिक मामला मानता है, लेकिन यह तो समूची दुनिया को पता है कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर विवाद है। कश्मीर में फैले आतंकवाद और अलगाववाद से पूरा विश्व वाकिफ है। इस मसले पर जहां कुछ देश भारत का समर्थन करते हैं वहीं कुछ देश पाकिस्तान का। सभी देशों की अपनी-अपनी राजनयिक कूटनीति है। अब अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने और लेने को लेकर जो सियासत देश में की जा रही है उससे पाकिस्तान को मौका मिल गया है। वह इस मामले को अंतरराष्ट ्रीयकरण करके इसे हरा करना चाहता है। घाटी के अलगाववादी यही चाहते थे, जिसे हमारे कुछ सियासी नेता पूरा कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में अभी जो कुछ भी हो रहा है उसमें जमीन कोई मसला नहीं है। सूबे की सरकार ने जब वन विभाग की जमीन को श्राइन बोर्ड को दिया और उस पर जिस तरह से अलगाववादियों ने प्रतिक्रिया जाहिर की, उसी से जाहिर हो गया था कि यह गुट शांत हो रहे कश्मीर में कोई मु ा तलाश रहा है। जमीन देने से उसे एक मु ा मिल गया था, लेकिन गुलाम नबी आजाद सरकार ने जमीन वापस लेकर मामले को बढ़ने से बचा लिया। जाहिर सी बात थी कि यदि सरकार जमीन वापस न लेती तो अलगावादी इसे मु ा बनाकर अपनी रोटियां सेंकते। इस आशंका के तहत आजाद सरकार ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस ले ली। इसके बाद अमरनाथ को जमीन दिलाने के नाम पर कुछ लोग मैदान में आ गए। समूचा जम्मू संभाग आंदोलन की आग में झुलसने लगा। यही नहीं कुछ सियासी दल इसे पूरे देश में फैलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। जम्मू संभाग के लोगांे का दर्द और था। वह अपनी उपेक्षा से आहत थे और इसे आवाज देना चाहते थे, लेकिन मामला ऐसे नाजुक माे़ड पर आ गया कि जहां से एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाईं नजर आने लगी। जम्मू वालों की असली पीड़ा तो दब गई और दूसरा मामला हावी हो गया। कुछ लोगों ने मामले को ऐसा रंग दिया जिससे यह मसला भारत की अंखड़ता के लिए संवेदनशील हो गया। दरअसल, आज जम्मू-कश्मीर में जो हालात हो गए हैं अलगाववादी और उनका आका पाकिस्तान ऐसे ही हालात की प्रतीक्षा में थे। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के नाम पर उन्होंने बवाल ही इसी लिया किया था। जब जमीन श्राइन बोर्ड से वापस ले ली गई तो उनके हाथ से मु ा निकल गया। लेकिन जब इस मसले पर सियासी दल मैदान में आ गए तो अलगावादियों को फिर बहाना मिल गया। अलगावादी विश्व समुदाय में यह संदेश देना चाहते थे कि हमारे प्रति भारत के लोग सही नहीं सोचते। हिंदुस्तानी यह तो चाहते हैं कि कश्मीर भारत में रहे, लेकिन कश्मीरी वहां न रहें। अपने इस सोच को वह अभिव्यि त देने में कामयाब रहे। लेकिन अपसोस कि इसमें उनका साथ दिया हमारे सियासी दलों ने। अब अलगावादियों केइसी नजरिये को पाकिस्तान अंतराष्ट ्रीय मंच पर उठाना चाहता है। सवाल उठता है कि जिस जमीन को लेकर आज जम्मू-कश्मीर जल रहा है वह इतनी अहम थी? जमीन दी गई थी फिर वापस ले ली गई इसलिए कि हालात न बिगड़ंे और किसी तीसरे को हाथ सेंकने का मौका न मिले। बाबा अमरनाथ की यात्रा पर तो रोक लगाई नहीं गई थी। अमरनाथ की यात्रा कराना केंद्र और राज्य सरकार का फर्ज है। और वह कराती भी है। यह यात्रा साल में दो माह के लिए होती है। इससे कश्मीरियों को भी आमदनी होती है। वह भी इसमें बढ़चढ़कर भाग लेते हैं। यात्रियों को सुविधा मिले इससे कोई इनकार नहीं कर सकता लेकिन कथित विवादित जमीन मिल जाने से ही यात्रियों को सुविधा मिल जाएगी, इसमें संदेह जरूर है। यात्रा का अलगववादियों ने भी विरोध नहीं किया है। लेकिन जमीन लेने के नाम पर जम्मू सहित पूरे देश में जिस तरह से हंगामा किया जा रहा है उससे यही लगता है कि जैसे अब अमरनाथ यात्रा हो ही नहीं पाएगी। कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए मामले का सियासीकरण कर दिया। कुछ लोग भावनाआें के नाम पर ही सियासत करते हैं। उनका पूरा वजूद ही इसी पर टिका है। यह लोग किसी की भावनाएं आहत करते हैं तो किसी की आहत होने पर हंगामा करते हैं। इन लोगों ने जमीन पर विवाद खड़ा करने से पहले यह नहीं सोचा कि देश का यह भाग आतंकवाद की आग में पहले से ही जल रहा है। पाकिस्तान की इस पर गिद्ध निगाह है। उसके पिठ्ठ ू कंधे पर बंदूक रखकर घूम रहे हैं। यदि मामले को तूल दिया गया तो पाकिस्तान को हाथ सेंकने का मौका मिल जाएगा। बाबरी मसजिद का मामला राष्ट ्रीय था। इसलिए उसे लेकर जो कुछ भी हुआ वह किसी हद तक देश तक सीमित रहा। हालांकि उसकी प्रतिक्रिया भी अंतरराष्ट ्रीय स्तर पर हुई और विश्व भर में फैले हिंदुआें को उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। फिर भी यह मामला ऐसा नहीं था कि कोई देश इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करता। लेकिन कश्मीर का मामला ऐसा नहीं है। इसलिए वहां पर ऐसी किसी भी हरकत पर विश्वभर के देशों की निगाह होती है। पाकिस्तान उसे भुनाने की पूरी कोशिश करता है। इस समय वह इसी मुहिम में लगा है। अमरनाथ जमीन विवाद पर हो रहे देशव्यापी आंदोलन ने उसे बोलने का मौका दिया है। इससे कश्मीर में बह रही अमन की हवा में भी आग लग गई है। आंदोलनरत जम्मू के लोगों का दर्द समझा जा सकता है। आजादी के बाद से ही उनकी उपेक्षा की गई है। केंद्र और राज्य सरकारें हमेशा कश्मीर को ही तवज्जो देती रही हैं। यह उनकी मजबूरी भी रही है, योंकि पाकिस्तान की वजह से कश्मीर में अलगावादियों की एक जमात बन गई थी। वह और न फैले इसके लिए कुछ कदम ऐसे उठाने पड़ते थे जिससे तुष्टि करण की बू आती थी या आती है, लेकिन यह सरकार की मजबूरी है। मामले की संवेदनशीलता उसे विवश करती है। कम से कम मुझे ऐसा लगता है। लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि जम्मू संभाग की उपेक्षा की जाए। यदि की गई है तो उसे दूर किया जाना ही चाहिए। अपनी उपेक्षा के कारण जम्मू के लोगों का आंदोलनरत होना स्वाभाविक है। उन्हें अपनी बात कहने का एक मौका मिला और उन्होंने अपनी भावनाआें को व्य त किया। उनकी मांगों और भावनाआें को समझा जा सकता है। लेकिन सियासी लोग उनकी भावनाआें का सत्ता के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। यह खतरनाक है। जाहिर है कि एक सही आंदोलन गलत दिशा में निकल गया है। जिसका लाभ सियासी दल उठा रहे हैं। यदि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने पर उसका विरोध करने वाले गलत थे तो जमीन वापस लेने के बाद उसका विरोध करने वाले भी गलत ही हैं। जमीन वापस लेने का विरोध करने वालों को समझना चाहिए कि घाटी के अलगावादी माहौल खराब करके धरती के इस स्वर्ग को बांटना चाहते हैं। हमें उनकी असली मंशा को समझना होगा। हम ऐसा मौका यों दी जिसका उन्हें लाभ हो? शायद भगवान शंकर ने जब कैलाश पर्वत को अपना डेरा बनाया होगा तो यही सोचकर कि वहां तक कम लोग ही पहंुचे। यही कारण रहा होगा कि वह दुर्गम पहाड़ पर रहने लगे। उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन के लिए उनके भ त इतनी सुविधा चाहेंगे कि कुछ गज जमीन के लिए आंदोलन पर उतर आएंगे। सुविधाआें की कोई सीमा नहीं होती। आज बाबा अमरनाथ का दर्शन करने लोग हेलीकॉप्टर से जाते हैं। इसका प्रभाव यह पड़ा कि अमरनाथ गुफा में बनने वाला हिमशिवलिंग समय से पहले ही पिघल जाता है। मानव जब सुविधाएं खोजता है तो प्रकृति से छे़डछाड़ करता है, जोकि प्रकृति प्रेमी भगवान शिव को पसंद नहीं है। यदि हेलीकॉप्टर सेवा को उन्होंने पसंद नहीं किया तो वन को काटकर बनाई जा रही सुविधाएं भी उन्हें पसंद नहीं आएंगी।&lt;br /&gt;साभार --- ओम प्रकाश तिवारी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-3739468454238408324?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/3739468454238408324/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=3739468454238408324' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/3739468454238408324'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/3739468454238408324'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html' title='बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-598371135132670194</id><published>2008-08-03T12:16:00.000-07:00</published><updated>2008-08-03T12:17:48.254-07:00</updated><title type='text'>अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो..</title><content type='html'>अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो॥ इस गीत के बोल एक बेटी की व्यथा को खुद व खुद बयां कर रहे है। समाज में बेटी के लिए सोच बदली तो है लेकिन कितनी बदलती है यह बहस का मुद्दा है। पर बेटी के मन की बात शब्दों का रूप ले भी ले तब भी समाज को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि आज भी बेटी को जन्म से पहले ही मारने का सिलसिला जारी है। कितने सेमिनार, कांफ्रेस और कैंप लगा कर लोगों को जागरूक किया जा रहा है, लेकिन घंटे आधे घंटे के भाषण में लोगों की सोच पर ज्यादा फर्क नहीं पड रहा। चाहे सरकार ने कानून बना दिए है, लेकिन डाक्टर खुद चंद रूपये के लिए पाप के भागीदार बन रहे है। क्या बेटी सच में मां बाप पर इतना बोझ बनती जा रही है कि उसको जन्म से पहले ही मार दिया जा रहा है। कितने गीतकारों ने अपनी कलम के माध्मम से अजन्मी बेटी के मन की बात को उजागर किया, कितने गायकों ने उसे अपनी सुरीली आवाज में लोगों पर पहुंचाया। फिर भी लोग बेटी को मारने के लिए वह पत्थर के दिल और खून से रंगे डाक्टर के हाथ कंपकपाते नहीं है। आज हर तरफ बेटियों ने अपना रूतबा कायम किया है। पर पुरूष प्रधान समाज को यह बात स्विकार करने में अभी वक्त लगेगा। मेरी इन शब्दों से लोगों को बुरा लग सकता है, पर सच्चाई यहीं है कि बेटी का खुद की समाज में पहचान बनाना हजम नहीं हो पा रहा। बेटे को तो सभी हक खुद ब खुद दे दिए जाते है, पर बेटी के लिए नजरिया आज भी सदियों पुराना है। बेटा कुछ भी करें सब माफ, बेटी जरा सी गल्ती पर बैठे तो खान-दान की दुहाई। एक तरह तो कहते है कि बेटे से खानदान का नाम रोशन करता है, फिर सिर्फ बेटियों पर पाबंदियां क्यो? बेटी मायके में है तो हर बात के लिए पिता या भाई से इज्जात जरूरी। बचपन से उसके मन में एक बात परिवार के सदस्य के जुबान पर होती है, जो करना है अपने घर जाकर करना। क्या कहेंगे वो यही सिखाया मां-बाप ने। बेटी अरमानों के साथ ससुराल में कदम रखती है, वहां पर भी उसके लिए अपना घर उसे कहीं नजर नहीं आता। अपनी मर्जी से कुछ कर लिया तो वहीं बात अपने घर क्या ऐसा करती थी। पराए घर की है न इसलिए कुछ पता नहीं इसको। फिर सवाल वहीं कि अपने के बीच रह कर बेटी का अपना घर कौन सा है। चारों तरफ उसके अपने है, पर अपनों की भीड़ में वह खुद को पराया महसूस करती है। आखिर कब बदलेगी बेटी के लिए समाज की धारना। आखिर कब मिलेगा उसे अपने घर का आसरा। मेरी बातें लोगों को पसंद नहीं आएगी, लेकिन क्या कोई बता सकता है बेटी का अपना घर कौन सा है। दोनों परिवार अपने है बेटी के लेकिन बेटी किसी की अपनी क्यों नहीं?&lt;br /&gt;साभार ---- मीडिया नारद, रजनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-598371135132670194?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/598371135132670194/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=598371135132670194' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/598371135132670194'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/598371135132670194'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/08/blog-post_03.html' title='अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो..'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-762856557966046503</id><published>2008-08-03T12:10:00.000-07:00</published><updated>2008-08-03T12:13:55.285-07:00</updated><title type='text'>क्या भारत नपुंसक है?</title><content type='html'>इस बार के इंडिया टुडे का शीर्षक है यह। पत्रिका ने धीरज खोते हुए लिख दिया है कि इंडिया नपुंसक है। लेकिन शीर्षक व्यापक बहस की मांग करती है। आतंकवाद को खुल कर मज़हबी नाम देते हुए कहा गया है कि भारत में इस्लामिक आतंकवाद से निबटने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है। पत्रिका के लेख में एक किस्म की बेचैनी दिखती है जो कई लोगों की भी हो सकती है। खासकर ऐसे वक्त में जब हर धमाका हमारे आपके बीच से किसी अज़ीज़ को अपाहिज़ बना देता है,मार देता है। लेकिन एक भी धमाका ऐसा नहीं गुज़रा जो इस्लाम के नाम पर हुए इस आतंकवाद के खिलाफ जनता में हिंदू और मुसलमान के हिसाब से फर्क कर दे। हर धमाके का दर्द दोनों समुदायों ने बराबरी से भुगता है और मिलकर एक दूसरे की मदद की है। संवेदनशील कहे जाने वाराणसी से लेकर मालेगांव और आर्थिक प्रगतिशील कहे जाने वाले हैदराबाद से लेकर बंगलूरु तक में धमाके के बाद कहीं हिंदू मुस्लिम की बात नहीं हुई। इस्लाम के नाम पर आतंकवाद और इस्लामी आतंकवाद में क्या फर्क है बहस करने वाले तय करेंगे। लेकिन एक ऐसे वक्त में नपुंसकता का एलान करना कहां तक ठीक है। जब देश का हर मुस्लिम नेता या मौलाना यह कह रहा हो कि इस्माल का संबंध आतंकवाद से नहीं है। देवबंद से लेकर अहमदाबाद और दिल्ली तक में रैलियां निकाल कर इसका एलान किया गया कि इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने वालों की इस्लाम में क्या दुनिया में कोई जगह नहीं है। जयपुर धमाके बाद जब ईमेल आया तो उसमें कुछ मौलानाओं को भी निशाना बनाने की बात कही गई जो आतंकवाद का विरोध करते हैं। साफ है मुस्लिम समाज खुल कर इसकी निंदा कर रहा है। पहले भी शामिल नहीं था लेकिन सार्वजनिक निंदा इसलिए कर रहा है ताकि याद रहे कि मुसलमानों ने इसकी निंदा की है। याद रहे कि अहमदाबाद के धमाके के बाद लखनऊ में आतंकवादियों के लिए बददुआ पढी गई। ज़ाहिर है कोई व्यक्ति या छोटा सा समूह किसी के इशारे पर चलने पर कामयाब हो रहा है। मगर यह कहना कि इसके पीछे मुसलमान हैं या इस्लाम हैं इसकी ठीक से पड़ताल होनी चाहिए। रही बात इंडिया के नपुंसकता की तो नपुंसक कौन है। क्या भारत के लोग नपुंसक हैं। या फिर सरकार नपुंसक है या फिर वो जनता नपुंसक है जो ऐसी सरकार चुनती है या फिर नपुंसक जनता ने तो मोदी की सरकार भी चुना। जो एलान करते रहे कि गुजरात से आंतकवाद का नामोनिशान मिटा दिया। आतंकवाद के नाम पर खास समुदाय को आतंकवाद समर्थक बता कर ज़लील करते रहे। और जब दुखद घटना हुई तो वहीं के अखबारों ने लिखना शुरु कर दिया कि बम निरोधक दस्ते से लेकर खुफिया एजेंसियों तक में लोग नहीं हैं। न अफसर न जासूस। तो फिर मोदी किस तैयारी के दम पर कह रहे थे कि उन्होंने आतंकवाद को मिटा दिया। अब क्या जवाब है उनके पास। पोटा नहीं है तो पुलिस तो है। और जनाब ने तो उस पुलिस का भी बंटाधार कर रखा है। क्या हर चीज़ को मर्दानगी और नपुंसकता के पैमाने पर देखा जा सकता है। क्या मोदी की मर्दानगी काम आई या फिर ऐसा मर्द चुनने में किसका कसूर था जिसने अपने शानदार कार्यकाल में कोई सशक्त एजेंसी तैयार नहीं की जो ऐसे आतंकवादी मंसूबों को कामयाब ही न होने दे। क्या पोटा के रहते जसवंत सिंह अपनी कार में अज़हर मसूद को लेकर कंधार नहीं गए। क्या पोटा के रहते संसद सुरक्षित रह सकी। क्या किया गुजरात की सरकार ने। उनके मंत्री के इस बयान के अलावा कि आतंकवादी हमेशा एक कदम आगे सोचते हैं। आतंकवाद का मसला है तो राजनीति होगी। अमेरिका में भी राजनीति होती है इंडिया में भी होगी। इस्लामी आतंकवाद होता तो मालेगांव की मस्जिद से लेकर हैदराबाद की मक्का मस्जिद तक में धमाके क्यों होते? क्या अजमेर शरीफ में धमाका होता? कट्टर इस्लाम मस्जिदों को पाक साफ करने की हिदायत देता रहता उन्हें मिटा देने की साहस उसमें भी नहीं है। वो कितना भी कट्टर क्यों न हो जिस दिन अल्लाह के ख़िलाफ हो जाएगा,उसकी इबादत की जगह के खिलाफ हो जाएगा,इस्लाम के नाम पर मरने वाले दो चार लोग भी न मिलेंगे। फिर ऐसा क्यों हुआ कि सभी आतंकवादी हमलों में हिंदू मुसलमान दोनों मारे गए। आखिर नपुंसक कौन है। अगर इंडिया को नपुंसकता मिटानी है तो क्यों न वो दूसरी चीजों में भी मिटाये। भ्रष्ट नेता संसद की देहरी तक आ जाते हैं,भ्रष्ट नेता पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए पैसा ले लेते हैं,बीजेपी को अपने आठ आठ सांसदों को बिक जाने के आरोप में निकालना पड़ता है,कांग्रेस को चुप रहना पड़ता है कि उसने पैसे दिये या नहीं दिये। मनमोहन सिंह इस दाग पर चुप्पी साध जाते हैं। क्या भारत की जनता नपुंसक इस बात के लिए नहीं है कि वह हर दिन टूटी सड़क देखती है लेकिन राम के नाम पर या पगड़ी के नाम पर या जाति के नाम पर उसी विधायक को वोट दे देती है जो घूस खाने के लिए सड़क को खराब हाल में छोड़ देता है। क्या पूरे भारत को नपुंसक कहना ठीक है। सरकार नपुंसक हो सकती है, पुलिस हो सकती है,कोई नेता हो सकता है लेकिन पुरा इंडिया। कहीं भड़काने का तो खेल नहीं चल रहा।सवाल यह नहीं कि हम नामर्द हैं। सवाल यह है कि हम क्या कर रहे हैं। और कैसे तय करें कि कौन ठीक कर रहा है इसके लिए तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बेहतर रास्ता क्या हो सकता है। सुषमा स्वराज अपना बयान वापस ले लेती हैं कि यूपीए के घूस कांड से ध्यान बंटाने के लिए अहमदाबाद में धमाके हुए। जब निंदा हुई तो व्यक्तिगत विचार कह कर उस बयान पर बनी रहती हैं। बदलाव इतना आया है कि यह बयान अब बीजेपी का नहीं है लेकिन सुष्मा स्वराज का है जो बीजेपी की हैं। ऐसा भी नहीं है कि भारत के लोगों ने आतंकवाद का मिल कर सामना नहीं किया है। इस्लाम से पहले इस देश में आतंकवाद सिख धर्म के नाम पर आया। तब इस हिसाब से सिखों को सबक सिखाने के लिए दिल्ली में जो कत्लेआम हुआ क्या उसे ठीक कहा जा सकता है। क्या उसे कहा जा सकता है कि ये रही हमारी मर्दानगी। हम जल्दी भूल जाते हैं। आतंकवाद का मसला व्यवस्था के फेल होने का मसला है। भारत की नपुंसकता का मसला नहीं है। व्यवस्था यूपी से लेकर आंध्र और अब गुजरात में भी फेल हुई है। अच्छा है मिल कर राजनेता कुछ करें। वर्ना सुष्मा स्वराज की तरह व्यक्ति बयानों के दम पर या नपुंसकता या मर्दानगी की हुंकारे भरने से समस्याएं दूर नहीं होती।&lt;br /&gt; साभार ---- कस्बा&lt;br /&gt;लेखक --- रविश कुमार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-762856557966046503?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/762856557966046503/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=762856557966046503' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/762856557966046503'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3427239926990980421/posts/default/762856557966046503'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdyudh.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='क्या भारत नपुंसक है?'/><author><name>अनिल भारद्वाज, लुधियाना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14372327329243537755</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_YoXK-1J8-1w/R9Q0gFMlL5I/AAAAAAAAAAg/v7JFx8f-Vd0/S220/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3427239926990980421.post-1915900758040342215</id><published>2008-04-26T11:54:00.000-07:00</published><updated>2008-04-26T11:57:04.114-07:00</updated><title type='text'>पं.सुरेश नीरव की कविता</title><content type='html'>सभ्यता के सर्प का हम दंश देखेंगे&lt;br /&gt;जिंदगी के कोण का हम अंश देखेंगे&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रहने लगे वातानुकूलित फ्लैट में &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;रावण  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब  महानगरों में लंका ध्वंस देखेंगे &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राधिका के जिस्म पर रेप के नीले निशान &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कृष्णवाली आंख से हम कंस देखेंगे &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बीवियां माध्यम बनी जिनकी तरक्की का &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उन अफसरों के पद नहीं हम वंश देखेंगे &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज तिकड़म के हुनर से योग्यता देखी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पराजितपांव कौऔ के दबाते हम हंस देखेंगे &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अपहरण धरती का आसमान करने को है &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अणुधर्मी वातास का विध्वंस देखेंगे।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-1915900758040342215?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/1915900758040342215/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=1915900758040342215' title='2 Comments'/><link rel='edit' 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type='html'>अभी भड़ास पढ़ रहा था की उसपर मेरे बेहद सम्मानीय अनिल भरद्वाज जी के कमेंट पढने को मिल गए .....क्या अनुभूति हुयी..कैसे कहूँ....तोः जान लीजिये....अनिल दादा के बारे में ...दैनिक भास्कर में सीनियर सब एडिटर हैं....सही बात कहने के आदी..आपको अच्छी लगे तोः बल्ले बल्ले, वरना पतली गली से निकल ले...हम सब अपने घरों से दूर थे लेकिन अनिल दादा का हंसोड़ और मस्त व्यवहार सबको बड़ा भाता था....हम सब काबिल और तेज लड़के थे लेकिन अनुभव और दुनियादारी की बेहद कमी... अनिल दादा जब देखते की हम लोग कोई चुतियापा कर रहे हैं तोः तुरंत सलाह देते .....वोः भी २४ कैरेट शुद्ध....इधर अनिल दादा ने भडास पर मुझे देखा और बेहद शानदार सलाह दे डाली...धन्यवाद दादा .......दरअसल यूं तोः हममे और इनकी पीड़ी में खासा फर्क था..हम ब्रांडेड के दीवाने खासकर मैं( मेरे पिताजी कहते हैं...ब्रांडेड सोचो, ब्रांडेड पहनो, ब्रांडेड करो) येः सलाह इतना पसंद आई की आजतक ब्रांड का भूत मेरा पीछा नही छोड़ता है...और अनिल दादा बेहद सरल जीवन जीने के आदी....पहले तोः लगा की यार इन ओल्ड मॉडल लोगों को कैसे झेलूँगा पर जब नजदीक आता गया तोःइन सब के प्रति श्रद्धा और सम्मान मन में उपजा...&lt;br /&gt;आज बडे दिन बाद अनिल दादा को देखा तोः रहा नही गया उनके प्रति आभार प्रकट करने से...और हाँ अनिल दादा लुधियाना में नवीन सर और राजीव सर से मेरा प्रणाम कहियेगा....इनके प्रति मेरे मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ श्रद्धा ही हो सकती है...और कुछ नहीं....बाकी उम्मीद है भास्कर में बुरे लोग अभी भी जिंदा होंगे उन्हे भी जिंदा रहने का हक है...और आपकी लड़ाई उनके ख़िलाफ़ जारी होगी.....लगे रहिये..प्रेम देने में और बुरे लोगों से लड़ने में...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3427239926990980421-8529050967157760741?l=shabdyudh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdyudh.blogspot.com/feeds/8529050967157760741/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3427239926990980421&amp;postID=8529050967157760741' title='1 Comments'/><link rel='edit' 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